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सीरिया और सऊदी अरब का रिश्ता व इतिहास | The Relationship and History of Syria and Saudi Arabia


परिचय (Introduction)

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जल्द ही सऊदी और सीरिया के बीच भी कूटनीतिक संबंध बहाल हो सकते हैं। 11 साल पहले यह रिश्ते टूट गए थे। इससे जुड़ी एक और बड़ी खबर यह है कि अगर सीरिया और सऊदी के डिप्लोमैटिक रिलेशन री- इन्सटॉल हुए तो सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद और उनके मुल्क की 22 अरब देशों के ग्रुप यानी अरब लीग में वापसी भी सकती है।


ईरान और सीरिया सऊदी अरब से रिश्ते (Iran and Syria Relations with Saudi Arabia)

न्यूज एजेंसी 'रॉयटर्स' की रिपोर्ट के मुताबिक - ईरान और सऊदी अरब के बीच रिश्ते सुधरने के बाद सीरिया ने भी ऐसा करने का फैसला किया है। ऐंबैसी अप्रैल में ईद के बाद खुल सकती हैं। गल्फ डिप्लोमैट ने बताया कि ये फैसला सऊदी अरब और एक सीरियन इंटेलिजेंस ऑफिसर के बीच कई दौर की बातचीत के बाद लिया गया। 

इस मामले में खास बात यह है कि जब ईरान और सऊदी अरब के डिप्लोमैटिक रिलेशन बहाल हुए तो चीन ने इसमें अहम रोल प्ले किया था। अमेरिका को इस बातचीत की भनक तक नहीं लगी। अब अगर सीरिया और सऊदी के रिलेशन बहाल होते हैं, तो गल्फ में अमेरिकी दबदबे को ये एक और बड़ा झटका होगा।


बशर अल असद का राजनीतिक परिचय (Political introduction of Bashar al-Assad)

1970 में बशर अल असद के फाइटर पायलट पिता हाफिज अल असद ने तख्तापलट करते हुए सीरिया की सत्ता संभाली। असद जब 17 साल के थे, तब 1982 में हाफिज ने कट्टरपंथी मुस्लिम ब्रदरहुड को कुचलने के लिए हामा में फौज उतारी। बताते हैं कि कम से कम दस हजार लोगों को कत्ल कर दिया गया। लेकिन असद ने जो राह चुनी, वह अलग थी, असद ने डॉक्टर बनना पसंद किया। दमिश्क यूनिवर्सिटी से आंखों की बीमारियों की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद बड़ी डिग्री लेने के लिए 1992 में लंदन चले गए। लेकिन जनवरी 1994 में आई एक कॉल ने असद के पढ़ाई दिशा बदल दी। बड़े भाई बासिल की कार एक्सिडेंट में मौत का संदेश मिला। बासिल अपने पिता के साथ सीरिया की सियासत में गहरे धंसे हुए थे और उन्हें उनका सियासी वारिस माना जा रहा था। हाफिज ने अब अपने सपनों का बोझ असद के कंधों पर रख दिया।

उत्तरी दमिश्क की एक मिलिट्री एकेडमी में उन्हें शामिल किया गया। जनवरी 1999 में उन्हें कर्नल का ओहदा मिला। लेकिन उनके पास बासिल जैसी जुझारू इमेज नहीं थी। लिहाजा करप्शन के खिलाफ एक अभियान का जिम्मा उन्हें दिया गया। इस अभियान ने असद को पब्लिक के बीच पॉपुलर कर दिया। परिणाम स्वरूप बशर अल असद सीरिया के लोगों के लिए उम्मीदों के चिराग की तरह रोशन हुए। साल 2000 में असद ने जब अपने पिता के इंतकाल के बाद सीरिया की बागडोर संभाली तो लोगों को लगा लंदन में रहकर आया डॉक्टर बेहद सख्त और अमूमन क्रूरता की हद तक चले जाने वाले शासन से राहत दिलाएगा।

असद ने राजनीतिक और दूसरे सुधार शुरू किए। प्रेस के भी हाथ खोले गए। 600 से ज्यादा राजनीतिक बंदियों को रिहा किया गया। लेकिन यह दौर लंबा नहीं चला। कुछ ही सालों में सख्तियों के काले बादल घिर आए। कइयों का कहना था कि हाफिज के समय सक्रिय रहे सेना के लोगों ने। असद को एक तरह से घेर लिया और सुधारों की राह बंद करा दी। 

एक बात शुरू से साफ थी कि सोशलिस्ट बाथ पार्टी के लीडर असद अरब जगत में शिया मुसलमानों के परचम की तरह उभरे। 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया तो असद ने उसका विरोध किया। वह इजरायल से दो-दो हाथ करने वाले लेबनान के हिज्बुल्ला ग्रुप के भी साथ थे।

इधर सीरिया में सुधारों का वादा भले ही किया गया, लेकिन 2007 में जो चुनाव कराए गए, उसमें किसी विपक्षी दल को मौका नहीं दिया गया। तब तक असद पर हुकूमत का नशा चढ़ चुका था। लोगों को जो थोड़ी-बहुत ढील दी गई थी अपनी बात रखने की, उसके चलते असंतोष के स्वर उभरने लगे थे। साल 2011, जब सीरिया में तंगहाली से बेजार लोगों ने करप्शन के खिलाफ आवाज उठाई, विरोध प्रदर्शन शुरू किए। वह अरब स्प्रिंग का दौर था।

ट्यूनीशिया के प्रेसिडेंट जाइन अल अबेदीन बेन अली और इजिप्ट के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को सत्ता से बेदखल किया जा चुका था। ट्यूनीशिया, इजिप्ट और लीबिया में अरब स्प्रिंग की लहरें उठने के बाद पूरे सीरिया में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। नागरिकों को ज्यादा अधिकार दिए जाने की आवाजें उठाई जा रही थीं। जिस सीरिया को असद से बदलाव की उम्मीदें थीं, वह टैंकों की गूंज से थर्रा उठा।

2011 में हुई एक छोटी सी घटना ने सीरिया में सिविल वॉर का रूप ले लिया। कुछ मुट्ठीभर बच्चों की गिरफ्तारी से शुरू हुआ ये संघर्ष सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद दुनिया के लिए अब तक का सबसे बड़ा मानवीय संकट बन चुका है। देश के राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ शुरू हुए हिंसक प्रदर्शनों और संघर्ष में लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

फरवरी 2011 का वक्त था, जब पूरे देश में असद सरकार के खिलाफ प्रदर्शनों का दौर चल रहा था। इसी दौरान यहां के दारा शहर में कुछ बच्चों को स्कूल में दीवारों पर असद सरकार के खिलाफ तस्वीरें बनाने के आरोप में अरेस्ट कर लिया गया। इन बच्चों ने ये दिखाने की कोशिश की थी कि लोग शासन का तख्तापलट करना चाहते हैं। इस अरेस्ट को लेकर लोगों का प्रदर्शन बढ़ गया और इसने हिंसक रूप ले लिया। सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए, जिसमें काफी लोगों की जान चली गई।

सरकार के बल प्रयोग के ख़िलाफ़ सीरिया में राष्ट्रीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया और लोगों ने बशर अल-असद से इस्तीफे की मांग शुरू कर दी। सीरिया में रासायनिक हमला, 58 की मौत वक़्त के साथ आंदोलन लगातार तेज होता गया। विरोधियों ने हथियार उठा लिए विरोधियों ने इन हथियारों से पहले अपनी रक्षा की और बाद में अपने इलाक़ों से सरकारी सुरक्षाबलों को निकालना शुरू किया।

असद ने इस विद्रोह को 'विदेश समर्थित आतंकवाद' करार दिया और इसे कुचलने का संकल्प लिया। उन्होंने फिर से देश में अपना नियंत्रण कायम करने की कवायद शुरू की। दूसरी तरफ विद्रोहियों का गुस्सा थमा नहीं था। वे भी आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार रहे। परिणाम स्वरूप दोनों पक्षों के बीच हिंसा लगातार बढ़ती गई।

2012 आते-आते सीरिया बुरी तरह से गृहयुद्ध में प्रवेश कर चुका था। सैकड़ों विद्रोही गुटों ने एक समानांतर व्यवस्था स्थापित कर ली ताकि सीरिया पर उनका नियंत्रण कायम हो सके। इसका नतीजा यह हुआ कि यह लड़ाई असद और उनके विरोधियों से आगे निकल गई। सीरिया की लड़ाई में क्षेत्रीय और दुनिया की ताक़तों की एंट्री हुई। इसमें ईरान, रूस, सऊदी अरब और अमरीकी का सीधा हस्तक्षेप सामने आया। इन देशों ने असद और उनके विरोधियों को सैन्य, वित्तीय और राजनीतिक समर्थन देना शुरू किया। सीरिया में कई देशों की एंट्री से युद्ध की स्थिति और गंभीर हो गई। सीरिया दुनिया का एक युद्ध मैदान बन गया। बाहरी देशों पर सीरिया में सांप्रदायिक दरार पैदा करने का भी आरोप लगा। सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं।


सीरिया और सऊदी अरब के फैसले पर अमेरीका का प्रभाव (America's influence on the decision of Syria and Saudi Arabia)

सऊदी अरब के बड़े सहयोगी अमेरिका ने सीरिया और असद से रिश्ते सुधारने का विरोध किया है। US स्टेट डिपार्टमेंट के एक अधिकारी ने कहा था कि अमेरिका सीरिया से संबंध बेहतर करने के मामले में अपने फैसले पर अडिग है। हम सीरियन सरकार के पुराने रवैये को नहीं भुला सकते। अमेरिका कभी दूसरे देशों को सीरिया से संबंध ठीक करने के लिए नहीं कहेगा।

सऊदी ने अमेरिका के कहने पर सीरिया से रिश्ते तोड़े थे। अब अगर सऊदी अरब यह फैसला लेता है कि वो सीरिया से डिप्लोमैटिक रिलेशन बहाल करेगा तो यह अमेरिका के लिए लगातार दूसरा झटका होगा। सऊदी ही नहीं, बल्कि तमाम गल्फ नेशन्स के पास 90% हथियार और टेक्नोलॉजी अमेरिकी है। अमेरिका ने अगर इस मामले में हाथ खींच लिए तो यह इन देशों के लिए मुश्किल दौर की शुरुआत होगी।

निष्कर्ष (Conclusion)

अंतराष्ट्रीय जानकारियाँ अंतराष्ट्रीय रूप से प्राप्त की जाती हैं। परिणाम स्वरूप कड़ी से कड़ी जोड़कर अनुमान ही लगाया जा सकता है कि स्थिति कुछ इस प्रकार रही होगी या वर्तमान में स्थिति ऐसी है। जो सरकार सत्ता में होती है, समान्य रूप से जनता के अशंतुष्ट होने पर उसे विरोध झेलना ही पड़ता है।

जिस प्रकार किसी के घर की सकारात्म व नकारात्म स्थिति का पता किसी पड़ोसी को चलता है जो पूर्ण सच है या नहीं कहा नहीं जा सकता, उसी प्रकार किसी एक देश की स्थिति का पता अन्य देश को चलता है। ऐसे में प्राप्त जानकारी सही है या गलत यह कहना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि जानकारी की समीक्षा दृष्टिकोण पर आधारित होती है। अर्थात किसी भी राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय खबर की समीक्षा (तर्क-वितर्क) आप निष्पक्ष होकर करें।

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Sunaina

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